NAYE BIMB, NAYE PRATEEK AUR NAVGEET
by DR. INDIWAR
₹400
| ISBN | 9789388940512 |
| Language | Hindi |
| Publication Year | 1 |
| Edition | 1 |
| Pages | 200 |
| Binding | Paper Back |
| Publisher | VPMANDIR |
About this book
नवगीत पूर्णतः बिम्बधर्मी काव्य है। बिम्ब की परख में ही नवगीत की पहचान छिपी है। आजकल जिस तरह कविता से सार्थकता गायब हो रही है और कथन की भंगिमा में सपाट जुगुप्साजन्य भाषा का प्रयोग हो रहा है, वह चिन्तनीय है। नवगीत इन सबसे अलग और इनके विरुद्ध मर्यादित भाषा के साथ तनकर खड़ा है। काव्य का रचनाधर्म अमूर्त से मूर्त का प्रत्यक्षीकरण कराता है। भाव, विचार, प्रत्यय आदि कल्पना कोष से निकल कर मन के कैनवास पर अनेक आड़ी, तिरछी और रिजु रेखाओं से एक आभासी दुनिया निर्मित करते हैं। यह आभासी दनिया धीरे-धीरे मर्त रूप लेती है। इसकी प्रस्तुति अपने आप शब्दचित्र रच देती है। ये चित्र कवि की अनुभूतियों के सारखण्ड होते हैं। ये इतने चुस्त, छिप्र और अर्थगुह्य होते हैं, जो कभी पिन से चुभते हैं तो कभी टीस पैदा करने वाले जख्म पर मरहम भी लगाते हैं। बिम्बों के अभाव में या बिम्बों की सही समझ के बिना नवगीत नहीं लिखे जा सकते। इधर नवगीत के क्षेत्र में घोर अराजकता व्याप्त हो गई है। अनेक फेक (Phake) नवगीतकार और नवगीत के झण्डाबरदार निकल आए हैं। ये स्वयंभू पुरोधा बिम्ब की सूक्ष्मता से अपरिचित हैं। इन्हें पता ही नहीं है, बिम्ब है क्या? बिम्ब की निर्मिति कैसे होती है ? कला और काव्य से उसका सम्बन्ध क्या है? वह कितने प्रकार का होता है? चूँकि नवगीत भारतीय काव्य परम्परा की अधुनातन धारा के रूप में प्रबुद्ध लोगों के बीच लोकप्रिय है, इसलिए कुकुरमत्ते की तरह, अधकचरे और अपरिपक्व नवगीतकार उग आए हैं। 'ग्रेसम्स लॉ' के अनुसार ये खोटे सिक्के असली सिक्कों को वातावरण से बाहर करने में लगे हैं। जेनुइन नवगीत-लेखक, समीक्षक और शोधार्थी इस कृति को पढकर असली और नकली नवगीत में भेद कर सकेंगे।