TULSI KA KRANTIDARSHI KAVI AUR JIVANKHOJ
by DR. INDIWAR
₹200
| ISBN | 9788193305164 |
| Language | Hindi |
| Publication Year | 1 |
| Edition | 1 |
| Pages | 254 |
| Binding | Paper Back |
| Publisher | VPMANDIR |
About this book
तुलसी को बार-बार पढ़ने और समझने की आवश्यकता है। उनके कवि का फलक अत्यन्त विशाल है। वे एक ही साथ सन्त और कवि दोनों हैं। भक्ति तो उनके सन्त का प्राण तत्व है। उनकी सन्तता एक क्रान्तिदर्शी व्यक्तित्व को निर्मित करती है जो उनके कवि के साथ रूपाकार होकर मूल्य मूढ़ता और रुढ़ियों के प्रति विद्रोह भाव का सृजन करती है। आलोचकों ने उन्हें समन्वयवादी कहा है। वे मानते हैं कि तुलसी ने काव्य और भाषा के साथ ही धर्म, संस्कृति और दर्शन के बीच में समन्वय करने का प्रयास किया है। क्या तुलसी जिस तरह सन्त और कवि एक साथ हैं, उसी तरह क्रान्तिदर्शी और परम्परा पोषक भी एक साथ हैं? मुझे लगता है क्रान्ति और परम्परा पोषण एक साथ नहीं चल सकता। परम्परा पोषक रूढ़िवादी होता है। क्रान्तिदर्शी विद्रोही। रूढ़ि और क्रान्ति एक साथ सम्भव नहीं है। दोनों में सामन्जस्य हो ही नहीं सकता। अतः तुलसी का व्यक्तित्व दो छोरों पर क्रियाशील दिखाई पड़ता है। वे न रूढ़िवादी हैं न परम्परावादी अपितु उनका व्यक्तित्व द्वैधवादी है। वे हिन्दू समाज को रामराज्य के आधार पर युग सापेक्ष बनाकर ले चलना चाहते हैं। अतः उनमें वर्णविहीन समाज का प्रस्थापन भाव और आन्तरिक समतामूलकता है तो मानवीय मूल्यवत्ता, रामोपासक सहज धर्म और मर्यादित सामाजिक सम्बन्ध की पक्षधरता भी। वे लोकतान्त्रिक समाजवादी राज्य व्यवस्था का सन्देश देना चाहते हैं। इस प्रकार वे समन्वयवादी नहीं क्रान्तिदर्शी कवि हैं। इसी तरह तुलसी के जीवन और जन्म स्थान को लेकर भी अनेक असंगतियां हैं। बिना देखे, बिना समझे जल्दी में निकाले गए निष्कर्ष हैं। उनका जन्म-स्थान राजापुर या बस्ती या कहीं और कहना ऐसी ही जल्दबाजी है। उनका प्रामाणिक जन्म स्थान सोरों जनपद एटा है। यह कृति विस्तार से उक्त बातों पर प्रकाश डालती है।