BHARTIYA KAVYASHASTRA KE SIDDHANT

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BHARTIYA KAVYASHASTRA KE SIDDHANT

by DR. JITENDRA NATH MISHRA

Hindi

₹450

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ISBN 9789384201494
Language Hindi
Publication Year 2022
Edition 2
Pages 530
Binding Paper Back
Publisher VPMANDIR

About this book

यह पुस्तक भारतीय काव्यशास्त्र के सभी प्रमुख संप्रदायों का गहन और सूक्ष्म अवलोकन करती है। इसमें न केवल रस संप्रदाय के विभिन्न आयामों (जैसे रस के अंग‚ रस भेद‚ रसनिष्पत्ति‚ और साधारणीकरण) पर विस्तार से विचार किया गया है‚ बल्कि अलंकार संप्रदाय‚ रीति संप्रदाय‚ वक्रोक्ति सिद्धांत‚ और औचित्य सिद्धांत जैसे अन्य महत्वपूर्ण सिद्धांतों का भी समावेश है। औचित्य को रस का सबसे बड़ा उपकारक माना गया है। महान् काव्यशास्त्री आनंदवर्धन ने ध्वनि के सांगोपांग विवेचन द्वारा रस की पुन: प्रतिष्ठा का नया अध्याय प्रारंभ किया और ध्वनि को काव्य की आत्मा के रूप में स्थापित किया। इन सभी सिद्धांतों की विस्तृत और तुलनात्मक विवेचना पुस्तक में शामिल है। पुस्तक में काव्य के आधारभूत तत्वों - काव्य लक्षण (काव्य का स्वरूप)‚ काव्य प्रयोजन (काव्य का उद्देश्य)‚ और काव्य हेतु (काव्य का कारण) - पर भारतीय और पाश्चात्य आचार्यों के विचारों का समालोचनात्मक प्रस्तुतीकरण है। इसके अतिरिक्त‚ शब्दशक्ति (अभिधा‚ लक्षणा‚ व्यंजना)‚ काव्य गुण (माधुर्य‚ ओज‚ प्रसाद)‚ और काव्य दोषों (शब्ददोष‚ अर्थदोष‚ वाक्यदोष‚ रस दोष) का भी सूक्ष्म विवेचन किया गया है। यह ग्रंथ संस्कृत काव्यशास्त्र के साथ ही हिंदी काव्यशास्त्र की परंपरा को भी जोड़ता है। यह न केवल रीतिकाल के आचार्य कवियों (जैसे केशवदास‚ चिंतामणि त्रिपाठी‚ मतिराम‚ देव) और उनके लक्षण ग्रंथों का संक्षिप्त परिचय देता है‚ बल्कि आधुनिक युग के काव्यशास्त्रीय विमर्श को भी समाहित करता है। आधुनिक विमर्श के अंतर्गत छायावाद‚ प्रगतिवाद‚ प्रयोगवाद‚ नई कविता‚ दलित विमर्श‚ और स्त्री विमर्श जैसे आंदोलनों को काव्यशास्त्र की परिधि के विस्तार के रूप में देखा गया है। आधुनिक हिंदी काव्यशास्त्र के छह प्रमुख आचार्यों (आचार्य रामचंद्र शुक्ल‚ आचार्य नंददुलारे वाजपेयी‚ डॉ. नगेंद्र आदि) के योगदान का मूल्यांकन एक स्वतंत्र अध्याय में किया गया है। लेखक ने इस पुस्तक की रचना सामान्य जिज्ञासुओं और छात्रों के हित में की है। लगभग ३७ वर्षों के अध्यापन अनुभव के दौरान महसूस की गई कठिनाइयों को दूर करने के लिए‚ उन्होंने मूल ग्रंथों के ज्ञान को सरल और सुबोध भाषा में प्रस्तुत किया है। इस पुस्तक का उद्देश्य यह है कि यदि किसी सिद्धांत की मूल अवधारणा स्पष्ट हो जाती है‚ तो पाठक स्वयं ही मूल ग्रंथों के गंभीर अध्ययन की दिशा में प्रवृत्त होंगे। यह पुस्तक भारतीय काव्यशास्त्र के जटिल सिद्धांतों को समझने का एक स्पष्ट और विश्वसनीय माध्यम है‚ जो पाठकों को स्वतंत्र एवं मौलिक चिंतन की दिशा में अग्रसर करेगी।

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