NAVGEET KA DASTAVEJ

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NAVGEET KA DASTAVEJ

by DR. INDIWAR

Hindi

₹500

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ISBN 9789384201661
Language Hindi
Publication Year 1
Edition 1
Pages 322
Binding Paper Back
Publisher VPMANDIR

About this book

हिन्दी कविता के इतिहास में बीसवीं सदी के छठे दशक की एक कुग्राहिता के प्रति प्रबुद्ध मानस सदैव चौंकता रहेगा। यह प्रश्न उसके मन में बार-बार कौंधेगा क्यों आखिर क्यों भारतीय काव्य परम्परा के छान्दस नैरन्तर्य को नकार दिया गया? क्यों गीत लिखना पिछड़ेपन की निशानी मान ली गई? क्यों आयातित आधुनिकता की भित्ति पर कविता को पाठ्य और केवल पाठ्य होने का नारा दिया जाने लगा? शायद 'तारसप्तक' से लेकर आज तक के अधिकांश कवि जो इस राह के राही हैं या रहे हैं, उनमें जीवन के जटिल यथार्थ को, आधुनिक वैज्ञानिक बौद्धिकता को छन्दों में बाँधने की या उसके बन्धन को ढीला कर अभिव्यक्ति में लयात्मक ‘कण्टेण्ट' लाने की क्षमता ही नहीं थी। इसे सिद्ध किया डॉ. शम्भुनाथ सिंह ने तथा उनके द्वारा संपादित नवगीत दशकों के नवगीतकारों ने। इनमें कवियों ने गीत धारा में रचनारत रहकर उसी को युग सापेक्ष नवीनता और आधुनिकता के बोध से भरकर, एक ओर जीवन में, मनुष्य के अन्त:करण में स्थायी और अमिट सहज भावों को अपनी रचनाओं के माध्यम से स्थापित किया तो जीवन की जटिलता, उसकी अन्तः संघर्षात्मकता और वैज्ञानिक बोध के परिणामस्वरूप उत्पन्न तमाम घात-प्रतिघातों के खण्डित, प्रातिभ, वैज्ञानिक और सांकेतिक बिम्बों द्वारा ऊकेरने का प्रयास किया। इसीलिए 'नवगीत दशक' के तीनों खण्ड समकालीन कविता में भारतीय काव्य परम्परा की धारा के दस्तावेज हैं। इनका मूल्यांकन किए बिना न तो नवगीत को समझा जा सकता है और न ही उसकी परख और पहचान की जा सकती है। इस मान्यता के आलोक में तथा उत्तर आधुनिक युगानुभूति के निकष पर ही इक्कीसवीं सदी का 'जेनुइन' नवगीतकार खड़ा हो सकता है। अत: यह कृति नवगीत का बिल्ला लगाकर 'फेक नवगीतकारों को अलगाने की समझ उत्पन्न करती है तथा नवगीत का सम्पूर्ण दस्तावेज भी प्रस्तुत करती है।

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